सबकुछ होने का वहम या अहम? मैं रोऊँ या हसूँ करूं मैं क्या करूं…?

मैं रोऊं या हँसू….करुँ मैं, क्या करुँ…, गानें की दो लाइने 1993 में निर्मित फिल्म अंजाम की हैं। ये लाइनें तब याद आ रहीं हैं जब ढ़लानभरी गलियों में लुढ़कने को आतुराइत सरकार ने अपने चहेतों को रेवड़ी की तरह प्रसाद परोस दिया। आईसीयू में ऑक्सीजन खींच रहे ये सरकार अगर चले गये, तो चहेते कहां खीर चुरोयेंगे? हालांकि दिया बुझते हुये ज्यादा भावत्ता है, सो भैया की भवकी किसी से छिपी नहीं है। हमारे मित्र इन दिनों की उठा-पटक और पकड़ा-पकड़ाई का खेल देखकर हमारे सामने बड़े मायूस होकर आ बैठे, और बड़ी मासूमियत भरे अंदाज में बोले कि अब गेंद एससी के पाले में चली गई! हम उनसे इस विषय में कुछ जानने की कोशिश कर पाते कि वो फिर एक किस्सा सुनाने लगे। मित्र बोले.. कि हमारे एक परिचित को जुआं खेलने की लत लगी हैं। एक बार जुआं खेलते समय अपने पास रखी सारी नगदी हार गये। मगर परिचित भैया धुन के पक्के और हठी व्यक्ति थे। अब उनके पास दांव लगाने के लिये कुछ शेष तो था नहीं। लेकिन हार स्वीकार नहीं थी। परिचित ने अंतिम बार सबकी नजरे बचाकर अपनी जेब टटोई! जेब से एक भूला-बिसरा सौ का नोट निकला। परिचित ने रंग बदला, शरीर फुलाया और दांव के ऊपर भी दांव चल दिया। सौ के नोट में पास रखी बीड़ी का मसाला निकालकर भर लिया और सिगार की भांति धुएं का छल्ला उडऩे लगे! ये चमत्कार देखकर सामने बैठे दांवबाज कनफ्यूज मतलब भ्रमित हो गये! उन्होंने सोचा कि जो व्यक्ति सौ के नोट को बीड़ी बनाकर पी सकता है उसकी जेब लबालब भरी होगी, सो पत्ते फिर चल पड़े। अब जेब में खुदा के बंदे तो थे नहीं, सो मन: स्थिति ने अंतिम दांव भी हरा दिया! अब परिचित का बुरा हाल हुआ? बस अंतिम बार यही कहते सुने गये की हाये राम लुट के लुट गये और पिट के पिट गये। मित्र फिर बोले… ये तो परिचित की कहानी थी खैर छोड़ो इसे। जैसी करनी वैसी भरनी? किस्सा सुनाने के बाद मित्र फिर बोले गर्मा-गर्मी यहां अभी बहुत बड़ी हुई है कहीं यहां भी सौ के नोट की बीड़ी से धुआं तो नहीं उडाया जा रहा है। खैर, हम बात कर रहे थे खीर चुरोने की, सो हडिया में खीर चड़ी होये और आगी निजा (बुझ) जाये? हालांकि 2-4 रोज में स्थिति सामने होगी लेकिन यहां कई सवाल उठ खड़े हैं कि कहीं बद्दुआओं का असर तो नहीं? आखिर नैतिकता कहां गई? पद की लालसा? अपनों की नाराजगी? सबकुछ होने का वहम या अहम?

अमितकृष्ण श्रीवास्तव

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